डॉ. व्ही. एस. वाकणकर

डोंगला – स्टॅण्डर्ड टाइम की गणना में महत्त्व

सन् १९८५ में डॉ. विष्णू श्रीधर वाकणकर -आधुनिक यंत्रों के विना – ग्राम डोंगला (३० किमीवास्तव में १२.९ किमी) तहसील महिदपूर जिला उज्जैन मध्यप्रदेश उस स्थान को दर्शाया जहाँ कर्करेखा और स्थानीय रेखांश (जिससे पुरातन काल में भारतीय समय को निश्चित किया जाताथा ) एक दूसरीको काटती हैं ।

[अक्षवृत्त २३° २६’ ४२.९१ “उ ]

[रेखांश ७५°४५’ ४३.३१” पू]

समुद्र सतह से ऊँचाई ५१५ मीटर

यह वही स्थान है जहाँ ग्रीष्मऋतु में अयन काल में २१ जून को सूर्य बिल्कुल सिर के ऊपर होता है यह वह स्थान है जहाँ दोपहर १२ बजे सूर्य की किरणें भूमि पर ९०° का अंश करती हैं ।और अपनी छाया नहीं पड़ती ।

यहाँ एक बात की ओर ध्यान देना चाहिए कि सदियों पहले कर्करेखा उज्जैन [२३°११’] से गुजरती थी । शायद इसीलिए उज्जैन में कर्क राजेश्वर का मंदिर बनाया गया था ।.

परन्तु पृथ्वी के झुकाव के कारण धीरे धीरे कर्करेखा उत्तर में जाती रही । और अभी ग्राम डोंगला तहसील महिदपूर, जिला उज्जैन, मध्यप्रदेश (Mahidpur District of Madhya Pradesh.) से गुजरती है ।

समय निर्धारण में डोंगला ग्राम का महत्त्व

वर्तमान में ग्रिनिच रेखांश (0°रेखांश) को मूल रेखांश याने आंतरराष्ट्रीय मानक रेखांश मानकर सारी दुनिया के समय का निर्धारण किया जाता है ।

प्रश्न यह है कि क्या ग्रिनिच को कोई खगोलशास्त्रीय दृष्टि से महत्त्व है जिसके कारण उसे आंतर्राष्ट्रीय मानक रेखांश माना गया ? क्रिस्ट के बाद शून्य रेखांश तो पॅरिस के लूव्र म्युझियम से जाता था । पॅरिस को भी क्या कोई खगोलशास्त्रीय दृष्टि से महत्त्व था ?सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीतिक प्रभुता के कारण ग्रिनिच को चुना गया था ?

“दा व्हिन्सी कोड” के लेखक डॉन ब्राउन कहते हैं -

Padmashree Dr. V. S. Wakankar “ग्रिनिच को मूल या मध्य रेखांश का स्थान देने से कई कई साल पहले पॅरिस के सेण्ट स्युलपीस चर्च में से आंतर्राष्ट्रीय मध्य मूल रेखांश जाता था ।आंतर्राष्ट्रीय मध्य मूल रेखांश को दर्शानेवाली पीतल की मार्कर लाइन वहाँ अभी भी है । फिर ग्रिनिच ने पॅरिस का वह सन्मान १८८८ में छीन लिया। मूल गुलाबी रेखा अभीभी मौजूद है ।“

पृथ्वीपर जीवन और दिनरात का बदलना सूर्य की किरणोंपर ही निर्धारित है । सूर्य की किरणों का ९०° पडना कर्करेखा और मकररेखा के बीच झूलता रहता है ।कर्करेखा उत्तर में और मकररेखा दक्षिण में अन्तिम रेखाएँ हैं जहाँ सूर्यकी किरणें दोपहर १२ बजे जमीन से ९०°का कोण करते हुए पडती हैं, (NOTparallel, butperpendicular) जिसे अयन कहते हैं । वैसा खगोलशास्त्रीय कोई महत्त्व ग्रिनिच को नहीं है ।

इस दृष्टि से डोंगला अधिक महत्वपूर्ण है कि कर्करेखा और स्थानीय रेखांश यहीं एक-दूसरी को छेदती हैं । इसी स्थान को भारतीय समय का मानक मान कर प्राचीन काल में समय निर्धारण होता था ।

डोंगला मीन टाइम न कि ग्रिनिच मीन टाइम

डॉ. वाकणकर का सुझाव है कि प्राचीन भारत में खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए तथा वेदिक गणना के लिए कर्करेखा पर स्थित उज्जैन को आधार माना जाता था । अब डोंगला को दुनिया का शून्य रेखांश माना जावे तथा आंतर्राष्ट्रीय समय की गणना डोंगला मध्य मान कर किया जाए। (डोंगला मीन टाइम न कि ग्रिनिच मीन टाइम कहा जाए)

डॉ. विष्णू श्रीधर वाकणकर वेधशाला

Padmashree Dr. V. S. Wakankar आधुनिक रोबोटिक वेधशाला मध्यप्रदेश काउन्सिल ऑफ सायन्स तथा टेक्नॉलॉजी द्वारा डोंगला ग्राम में बनायी गयी है ।

वेधशाला के गुंबज का व्यास ५ मीटर है और जमीन से ऊँचाई १० मीटर है । छूँकि आसपास केल कृषिभूमि है और कहीं कृत्रीम प्रकास नहीं है, रात के समय आकाश का निरीक्षण करने के लिए यह स्थान आदर्श है ।

इसका निर्माणकार्य M/s Pedvak of Hyderabad.द्वारा किया गया है ।

डॉ. तरुण बांगिया (ARIES नैनीताल), श्री भूपेश सक्सेना (MP CoST, भोपाल) तथा डॉ.पद्माकर परिहार ( IIA बंगलुरु) के नेतृत्व में वेधशाला की स्थापना की गयी ।

टेलिस्कोप : ०.५ मीटर या २०” Planewave CDK Telescope. It is a corrected Dall-Kirkham Astrograph.

f/6.8 टेलिस्कोप की apparent focal लंबाई 3454मि.मी. है । उसका mounting German Equatorial from Paramount है और उसमें रोबोटिक कण्ट्रोल है ।

टेलिस्कोप के साथ CCD कॅमेरा लिया गया है जो Apogee alta U9000, a large format, 38 x 38 mm square sensor with 3056 x 3056 pixels, जो 38’ x 38’ का व्ह्यू देगा. इमेजिंग मीडिया तथा छोटी गॅलेक्सी के लिए फाइल्ड व्ह्यू आदर्श है । सभी उपकरण M/s Audo Viso Pvt. Ltd. द्वारा पूर्ती की गये हैं ।

इस प्रकार की वेध शाला सामान्य जनता तथा विशेषतः बच्चों के लिए बहुत उपयुक्त है ।

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