डॉ. व्ही. एस. वाकणकर

लुप्त नदी सरस्वती का शोध

संस्कृतियों के बनने में नदियों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभायी हैं । कतिपय प्राक्-ऐतिहासिक संस्कृतियाँ नदियों के किनारेपर ही पनपी । भारत की संस्कृति जो सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से जानी जाती है , क्योंकि प्राक् ऐतिहासिक काल के हड़प्पा और मोहेनजो-दारोके अवशेष सिंधुनदी के किनारे पर पाये गये जो वर्तमान पाकिस्तान में हैं।

सरस्वती नदी का उल्लेख वैदिक साहित्य में बहुतायत से आता है । उसका उल्लेख नदीतमा – बहुत बड़ी नदी इस अर्थ में आता है ।

वर्तमान में ऐसा माना जाता है कि अदृश्य नदी सरस्वती गंगा-यमुना के संगमस्थान त्रिवेणी संगम प्रयाग, उत्तर प्रदेश. इस विश्वास के मूल तथा संगम के विषय में कहीं उल्लेख नहीं पाया गया है ।

हड़प्पा तथा मोहेनजो-दरो के अवशेषों ने मनगढंत इतिहास जोडा गया की आर्य बाहर से आये और उन्होंने हड़प्पा और मोहेनजो-दरो के मूल निवासियोंको वहाँसे पूर्व की ओर खदेड़ा ।

इस मत के आधार में ऐसी किसी घटना का प्राक-इतिहास के साहित्य में उल्लेख नहीं है । परन्तु वैदिक साहित्य सरस्वती नदीकी स्तुती में श्लोक-मंत्रोंसे भरा है, और नदीसे प्रार्थना है की वह उन्हे छोड़कर न जाए जिससे संकेत मिलता है की नदी का पानी धीरे धीरे कम हो रहा है और परिणामतः नदी लुप्त हो गयी ।

अतः यह नितान्त आवश्यक हो गया कि वास्तविकता का पता लगाया जाए । और विशेषज्ञोंका एक समूह सरस्वती शोध अभियान में हाथ बँटाने तैयार हो गया । डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर इस गुट के अग्रणी थे ।

यह वेबसाइट उस समूह के प्रयासों को समर्पित है और आगे चर्चा एवं संशोधन हेतु परिकल्पनाएँ वं प्रमाण प्रस्तुत हैं ।

इस उपक्रम को लेने से पहले भी कई लोगोंने अपने व्कितगत स्तर पर सर्व्हे तथा संशोधन किया. उनके प्यासों तथा संशोधन तकनीकी तथा स्रोतो की उपलब्धियों की दृष्टि से सीमाएँ थी फिर भी इस उपक्रममें उनका बहुत योगदान है ।

यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि लुप्त सरस्वती नदी की खोज सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रही बल्कि उस काल की संस्कृती के मूल का अध्ययन भी शोधकार्य में सम्मिलित था ।

  1. सरस्वती नदी का सबसे पहला उल्लेख मिलता है जनरल सर कनिंगहॅम द्वारा किया हुआ –मिलिटरी कमांडर के काम का अलावा प्राक्-ऐतिहासिक स्थानों के अध्ययन में उनकी रुचि थी । हिमालय की घाटियों के सर्वे का दौरान – सरसुती नदी – नाम सामने आया और उन्हें सरस्वती नदी की याद आ गयी । उन्हों ने एक वाक्य का ज़िक्र किया – अल बेरुनी ने महम्मद गज़नी के आक्रमण के समय, सरस्वती नाम की एक नदी में केवल पत्थर ही पत्थर हैं – कहा है । [Archaeological Survey of India, Vol. 14 Pahe 88, 1887]
  2. आर्थरएमॅडोनाल्ड ने "A History of Sanskrit Literature" in 1887. में सरस्वती नदी का वर्णन किया है
  3. ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता अरिअल स्टेन ने १९४२ में सरस्वती नदी का स्वतंत्र सर्व्हे किया था ।
  4. आर्थर मॅक डोनाल्ड के साथी कीथ ने ऋग्वेद के मंडल १०-७५-५ का उल्लेख करते हुए लिखा है – थानेश्वर की पश्चिम में घागर के पश्चिमी स्रोतों से पहाड में मिलकर सिरसा से होते हुए भाणेर के वीरान में लुप्त हो गयी ।
  5. डॉ. एन ए गोडबोले Head of Technical Science branch of Banaras Hindu University ऋग्वेदिक सरस्वती का १९६३ में गहन अध्ययन किया ।
  6. अमेरिकन सटलाइट लॅण्डसॅट ने अपने आकाशीय छायांकन द्वारा सटलाइट मॅप्स मे सरस्वती के सूखे पात्र दिखाये हैं ।

इस ने वर्तमान अध्ययन के लिए आवश्यक प्रारंभिकसामग्री तथा संशोधन हेतु प्रेरणा दी ।

श्री. मोरोपंत पिंगळे के अनुनय पर वेदिक नदी सरस्वती विषय पर १० फरवरी १९८३ के दिन कृष्णधाम कुरुक्षेत्र में सेमीनार आयोजित किया गया । इस सेमिनार का उद्देश था – सरस्वती नदीअनुसंधान की पूर्णरूप से कार्यपद्धति तैयार करना हर विभाग का कार्यक्षेत्र तय करके उनकी सीमाओं का निर्धारण, तथा कार्य की रूपरेषा, विशेषज्ञों और स्वयंसेवकों की सेवा के विषय पर निर्णय लेना आदि.

इस सेमिनार का उद्घाटन कुरक्षेत्र विश्वविद्यालय के भारतीय इतिहास, संस्कृति और प्राक् इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. उदयवीर सिंह के हस्ते हुआ । बाद में उनके ही विभाग के प्राध्यापक श्री हरि अनंत फडकेद्वारा सरस्वती नदी विषय पर बहुत ही सुंदर भाषण दिया गया और तुरंत उसके बाद सरस्वती नदी अध्ययन केन्द्र का गठन हो गया । इसके बादप्रांतीय स्तर पर १३ फरवरी १९८३ को संस्कृत के विद्वान प्रा. स्थानुदत्त शर्माने अध्यक्षीय भाषण दिया । श्री. मोरोपंत पिंगळे, डॉ. व्ही एस वाकणकर, श्री ठाकुर रामसिंहजी ने सेमीनार के सहभागियों को मार्गदर्शन किया । हरियाणा के १५ सदस्योंकी एक स्थानीय समिती बनायी गयी, जिसके चेअरमन थे डॉ. ओमप्रकाश भारद्वाज ।

सूखी सरस्वती का मार्ग सटलाइट द्वारा हिमाचल प्रदेश, हरयाणा, राजस्थान और गुजरात से गुजरता दिखाया गया तो निम्नलिखित सदस्यों को लेते हुएएक सलाहगार समिती का गठन किया गया ।

  1. पद्म श्री डॉ. व्ही एस वाकणकर - संयोजक
  2. श्री. मोरोपंत पिंगळे – नागपूर
  3. डॉ. स्वराज्य प्रकाश गुप्ता - दिल्ली
  4. डॉ.रतनचन्द्र अग्रवाल – जयपूर
  5. डॉ. के पी धुरंधर दिल्ली
  6. श्री. ठाकुर रामसिंह चंदीगड
  7. पंडित स्थानुदत्त शर्मा कुरुक्षेत्र
  8. प्रो. बंसीभाई सोनी - अहमदाबाद
  9. डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल – कुरुक्षेत्र
  10. पं चन्द्र बाली -दिल्ली
  11. पं. प्रेमवल्लभ शास्त्री - गुजरात
  12. डॉ. सुरेशचन्द्र वाजपयी – दिल्ली
  13. डॉ. सुरेन्द्रकुमार आर्य उज्जैन
  14. डॉ. भावनेश्वरप्रसाद गुरुमैता हिस्सार
  15. डॉ. नित्यानन्द शर्मा देहरादून
  16. डॉ. ठाकुरप्रसाद वर्मा - काशी
  17. डॉ. सुमनवाहन पंड्या अहमदाबाद
  18. डॉ. जी. पी. देशमुख - जयपूर

श्री. विश्वबन्धुजी ने दिल्ली कार्यालय का व्यवस्थापन किया ।

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