जन्म : ४ मई १९१९ नीमच ( म. प्र.)

शिक्षण : प्राथमिक – धार , G D Art (मुंबई); MA, Ph. D. (इतिहास, पुरातत्व – पुणे)

संस्थापक : भारती कला भवन उज्जैन, ललित-कला केन्द्र (चित्रकारी, रंगकार्य, शिल्पकार्य, मूर्तिकारी इत्यादि)

निबंध व प्रकाशन :

उन्होने राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीयसंगोष्ठियों में निबंध प्रस्तुत किये । उनके नाम ६ से अधिक पुस्तकें और ४०० प्रकाशन हैं और उन्होंने विदेशों में १६ से अधिक व्याख्यान दिये ।

उन्होंने भारत में तथा विदेशों में (यू.के. ऑस्ट्रिया, फ्रान्स, जर्मनी, स्पेन, ग्रीस, मेक्सिको इजिप्तऔर अमेरिका )स्टडी टूर्स, म्युझियम्स तथा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथा पुरावशेषोंके स्थान देखने, संगोष्ठियों में भाग लेने, व्याख्यान देने, प्रदर्शनियाँ करने आदि के लिए भ्रमण व यात्राएँ की ।

पुरातत्विक सर्व्हे और उत्खनन :

डॉक्टर वाकणकर ने ४००० से अधिक चट्टानोंमें बने आश्रय स्थानों की भारत में खोज की.

उन्होंने निम्न लिखित स्थानोपर विस्तृत उत्खनन का कार्य किया – महेश्वर (१९५४) ,नवदा टोली (१९५५). इन्द्रगढ (१९५९), मनोती (१९६०), आवारा (१९६०), कवठा (१९६६), मन्दसौर (१८७४, ७६), आझादनगर (१९७४). डांगवाडा (१९७४), रुनिजा (१९८०) उसी तरह व्हेर्कोनियमरोमन स्थान इंग्लण्ड १९६१ और इन्कोलिव फ्रान्स (१९६२) इत्यादि

महत्त्व पूर्ण योगदान :

विश्व विख्यात करनेवाले कार्यों मे एक भीमबेटकाके प्रस्तर आश्रय की खोज, २) लुप्त सरस्वती नदी की खोज ३) खगोल शास्त्र की दृष्टिसे महत्वपूर्ण स्थान उज्जैन के पास डोंगला ग्राम

भीमबेटका में प्रस्तर आश्रय :

भोपालसे ५५ किलो मीटर पर भीवनपूर जिले में रातपानी अभयारण्यमें प्रस्तर आश्रय में मानव द्वारा रंगेचित्र हैं, वे भी १०.००० वर्ष पूर्व के होंगे । वे चित्र अभीभी सुव्यवस्थित रखे गये हैं जो उस काल के वहाँ के प्रस्तर आश्रयमें रहनेवाले लोगों के जीवन की झांकी प्रस्तुत करते हैं ।

वे कुल ७५० प्रस्तर आश्रय हें । उनकी अपनी क्रमबद्धता और सघनता के कारण “World Heritage Site” माना गया है औरप्रस्तर कला में भारत का नाम अग्रगण्य हो गया है ।

सरस्वती नदी :

सरस्वती नदी की खोज दूसरा महत्त्वपूर्ण योगदान है ।डॉ. व्ही. एस. वाकणकर द्वारा अग्रेसर टीम ने केवल सरस्वती नदी के मार्ग की ही खोज नहीं की बल्कि हडप्पा मोहेंजो-दरो-काल के अन्य स्थानों की भी खोज की । चूँकि वेदिक साहित्य के अनुसार अपनी संस्कृति इसी नदी के किनारे पनपी सिंधु घाटी सभ्यता इस नाम के स्थानपर सारस्वत सभ्यता नाम दिया जावे ।

डोंगला ग्राम :

उज्जैन, (मध्यप्रदेश) के पास डोंगला ग्राम में डॉ. व्ही. एस. वाकणकरने वह निश्चित स्थान दर्शाया जहाँ कर्करेखा तथा स्थानीय रेखावृत्त एकदूसरे को छेदते हैं । मकर-संक्रांति के समय जब सूर्य ख-मध्य पर ( सिर के बिल्कुल ऊपर ) होता है तो अपनी छाया नहीं दिखती । यह स्थान खगोल विद्या की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है । वैदिक काल में इसी स्थान से समय की गणना की जाती होगी अतः ग्रिनिच के स्थान की जगह इस स्थान को शून्य रेखांश माना जावे । मध्यप्रदेश शासन ने हाल ही में आधुनिक खगोल विद्या अध्ययन केन्द्र की आधारशिला रखी है । ताकि भारतीय खगोल विद्या के उपासक यहाँ अध्ययन कर सकें ।

उनका सुझाव था की इस स्थान की विशेषता को ध्यान में रखते हुए और खगोल विद्या में भारतीय योगदान को मद्देनज़र करते हुए शून्य रेखावृत्त को ग्रिनिच के स्थान पर डोंगलाग्राम में ऱखना चाहिए तथा DMT (Dongla Meridian Timeन कि GMT (Greenwich Meridian Time.

इतिहास, पुरातत्व और प्रस्तरकला व आश्रयों की खोज तथा भोपाल के पास भीमबेटका के प्रस्तर आश्रय और वहाँ की चित्रकारी को युनेस्को द्वारा वर्ल्ड हिरिटेज का दर्जा दिया गया । इसका श्रेय डॉ. वाकणकर को १९७५ में पद्म श्री की उपाधि देकर नवाज़ा गया ।

महत्वपूर्ण अन्वेषण :

  1. परमारकालीन २३ शिलालेख – धार
  2. मालवा में ६८ से अधिक स्थानों पर ताम्रपत्र
  3. सारे भारत में ४००० से अधिक प्रस्तर आश्रय
  4. धार में राजा भोज की महुदी ताम्रपट्टिका
  5. मान्याखेडा के राष्ट्रकूट राजवंश के राजानान्नाप्पा इन्द्रगढ का शिलालेख
  6. गुजरात केसिद्धराज जयसिंह काबिलपंक प्रशस्ती
  7. सौधांग में मौर्यकालीन हाथी राजधानी
  8. मनौती में हडप्पा संस्कृती के अवशेष
  9. आवारा में काले और लाल बर्तन संस्कृति
  10. उज्जैन के पास कयठा ताम्र युग संस्कृति के अतिशय पुराने अवशेष
  11. उज्जैन में शक शिलालेख
  12. उज्जैन में विजयसिंह के शिलालेख
  13. उज्जैन के१५,००० सिक्कोंकी खोज और उनका वर्गीकरण
  14. भारत के बाहर लाल समुद्र के पासकसाइन में दो ब्राह्मीमें लिखित शिलालेख और उनका विश्लेषण (दो टॅब्लेट बाबीलोन की भी)
  15. कांच के मुद्रांक और ४ ग्रीक ताबीज ( रक्षाकवच)
  16. अमेरिका में अर्यो हाण्डो, रियो ग्रांदे कनयन और मकोन जॉर्जिया में नये स्थानों का शोध
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